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वायरस क्या है ?तथा वायरस कि खोज किस ने कि थी?/virus kiya hai /virus ki khoj kisne kiya thi

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virus kiya hai /virus ki khoj kisne kiya thi /वायरस क्या है तथा वायरस कि खोज किस ने कि थी?


हेलो दोस्तो आप को मालूम होगा कि काफी बीमारियों का मुख्या कारण वायरस (बिषाणु) ही होते हैं। चाहे वो कोई भी बीमारी हो ।
हमारे शरीर को बीमार करने में बीषाणु का ही योगदान रहता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि वाइरस की खोज किसने की तथा किसने पता लगाया कि वायरस ही बीमारियों का मुख्य  कारण है ।

वायरस शब्द लैटिन भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता बिष या बिषाणु।
वायरस में बहुत छोटे छोटे रोग के कण  होते हैं जो कि किसी भी वातावरण में मिल जाते हैं। वैज्ञानिकों  द्वारा  वायरस को मृत तथा जीवित दो वर्गों में विभाजित किया गया है।
वायरस के माप में भी भिन्नताएं पाई जाती हैं जोकि हर स्तिथि में अलग अलग होती है ।
सबसे छोटा वायरस 10  मिलीमाईक्रोन ब्यास का होता है जो मानव शरीर में डायरिया रोग को जन्म देता है जिसका नाम पारवोवायरस है।
तथा सबसे बड़ा वायरस चेचक रोग का होता है जो लगभग 300 से 400 मिलीमाईक्रोन ब्यास का होता है।
वायरस के प्रमुख लछण - वायरस में  अक्सर कुछ ऐसे लछण पाए जाते हैं जो किसी अन्य जीव में नहीं होते हैं-

डार्विनवाद (darwinism) क्या है?/ वैज्ञानिकों द्वारा डार्विन वाद कि आलोचनाएं/Darwinwad kiya hai?

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Darwinwad kiya hai?/डार्विनवाद (darwinism) क्या है?
चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन का ये सिद्धांत उनके समुद्री यात्रा के दौरान घटित तथ्यों पर आधारित है ।
उन्होंने ये यात्रा 1831 से 1836 तक दछिण अमेरिका जाने वाले एक ब्रिटेन जहाज से कि थी जिसका नाम एच.एम.एस बिगल था ।
चार्ल्स डार्विन के अनुसार - 1-जीवो में प्रजनन के द्वारा अधिक सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता होती है।
2-प्रत्येक जीव में अधिक प्रजनन दर की तुलना में इस पृथ्वी पर जीवो के लिए आवास तथा भोजन नियत है । व जीवो में अपने  अस्तित्व के आपस में संघर्स होने लगता है।
3- अस्तित्व के लिए संघर्स  दूसरी प्रजातियों के साथ साथ प्रकृति तथा वातावरण के साथ भी हो सकता है।

4-प्रकृति के हर जीव में कुछ ना कुछ असमानताएं होती हैं जीवन के लिए वही जीव योग्य होते हैं जो सबसे ज्यादा प्रभावशाली होते हैं आरोग्य गुणों वाले जीव नस्ट हो जाते हैं।

5-जीवन के संघर्ष में सफल होने वाले जीव अधिक समय तक जीवित रहते हैं और अपने बंस को  आगे बढ़ाने में कामयाबी हासिल करते है.।
1858 में डार्विन और बैलेष ने मिलकर अपने कार्यों को पूरे रूप से प्राकृतिक चयनवाद के रुप में प्रकाशित किया…